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दिल्ली का ब्रहमपुरी – हिन्दुओ के पास 2 ही आप्शन, या तो भाग जाओ या इस्लाम, देश की राजधानी में कैराना

Brahampuri Delhi : सेकुलरिज्म ने बर्बाद कर दिया, राजधानी के कई इलाकों में हिन्दुओ के पास 2 आप्शन – पलायन या इस्लाम, हमारा ये आर्टिकल शायद बहुतों को अच्छा नहीं लगेगा, क्यूंकि इस देश में सेकुलरिज्म जो चल रहा है

हम बार बार अपने पाठको को कहते आये है की हम भारत देश के लोग चाहे कितना भी जीडीपी मजबूत कर ले, कितना भी चंद्रयान छोड़ लें, हम सेकुलरिज्म की राह पर सिर्फ बर्बादी की ओर बढ़ रहे है, एक दिन न हमारी आने वाली पीढ़ी बचेगी, और देश तो छोडिये, “भारत” शब्द भी नहीं बचेगा, ये कड़वा सच है

ऊपर अख़बार पढ़ रहे है आप, ये देश के किसी अन्य इलाके की नहीं बल्कि दिल्ली की खबर है, दिल्ली का ब्रहमपुरी जहाँ हिन्दू अपने घरों पर “ये मकान बिकाऊ है” लिखकर कहीं और भाग गए है, क्या करते बहु बेटियों का घर से निकलना नामुमकिन सा हो, मंदिर में मांस फेकना जाये, घरों को चुन चुन कर कभी कचरा, कभी टट्टी फेंकी जाए, जीना नरक कर दिया जाये तो आखिर क्या करेगा हिन्दू

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और हिन्दू तो खुद ही इसका दोषी है, सेकुलरिज्म जो निभाता आया, कल कैराना, आज ब्रहमपुरी, कल कोई नया शहर, जैसे जैसे वो बढ़ रहे है और आप सेकुलरिज्म निभाते घट रहे है, आपका भविष्य कैराना और ब्रहमपुरी की तरफ ही जा रहा है

बाकि राज्यों को छोडिये देश की राजधानी दिल्ली में कई कई मिनी पाकिस्तान बन चुके है जहाँ हिन्दुओ का जीना नरक है, यहाँ तक की पुलिस भी इन इलाकों में आने जाने से भयभीत रहती है, सुल्तानपुरी से 30 साल के सद्दाम अंसारी ने इसी 13 अगस्त 2018 को 14 साल की हिन्दू लड़की को उठाया, आजतक पुलिस उस लड़की को न खोज सकी, और न ही सद्दाम अंसारी का कुछ कर सकी

Brahampuri Delhi : ये जो ब्रहमपुरी वाली खबर है वो किसी मीडिया ने नहीं बताया जबकि सारे मीडिया हाउस दिल्ली में है, पंजाब केसरी ने इस खबर को छापा और अब दैनिक भारत भी इस खबर पर आर्टिकल लिख रहा है, बाकि किसी मीडिया को क्या पड़ी है हिन्दुओ की

अगर इस देश में किसी अब्दुल को 1 थप्पड़ भी पड़ जाये तो कई बार नेशनल डिबेट हो जाता है, पर देश की राजधानी में हिन्दुओ का ये हाल हो रहा है, पर किसे पड़ी है, न मीडिया न बुद्धिजीवी और न नेता

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आज ब्रहमपुरी का ये हाल है, कल आपके शहर का, आज कोई और पीड़ित है कल आप, सेकुलरिज्म चलता जा रहा है और हमारा भविष्य बर्बादी की ओर बढ़ता जा रहा है

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3 Comments

  1. If the Maharashtra government has its way, the onus for implementing the Centre’s “historic” decision to fix minimum support prices (MSP) for crops at 1.5 times their average production costs will not lie with state procurement agencies.

  2. Like!! I blog quite often and I genuinely thank you for your information. The article has truly peaked my interest.

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