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टैगोर ने गन गण मन भारत के लिए नहीं बल्कि ब्रिटिश राजा की तारीफ के लिए लिखा था

27 दिसंबर, के दिन 1911 में प्रथम बार जन मन गण गाया गया था !!

1901 में जॉर्ज पंचम (जॉर्ज फ्रेडरिक अर्नेस्ट अल्बर्ट) ने भारत की यात्रा की, यहां जातीय भेदभाव देखकर, जॉर्ज पंचम को अपार घृणा हुई, 1911 में महाराजा जॉर्ज व महारानी मैरी के तिलक हेतु दिल्ली दरबार सजाया गया दोनों भारत के सम्राट व सम्राज्ञी घोषित किये गये, ब्राहमणों ने भारत के राजमुकुट से जॉर्ज पंचम का राजतिलक किया एवं स्तुति-वंदना की, जॉर्ज ने नव-निर्मित भारत का इम्पीरियल मुकुट पहना बंग-भंग का निर्णय रद्द हुआ जिसका सभी ने स्वागत किया

साहित्यकार बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ ने जार्ज पंचम की स्तुति में “सौभाग्य समागम”…अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने “शुभ स्वागत”…श्रीधर पाठक ने “श्री जार्ज वन्दना” तथा नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ ने “महेन्द्र मंगलाष्टक” जैसी हिन्दी में “उत्कृष्ट-भक्तिभाव” की रचनायें लिखकर जॉर्ज की बढ़-चढ़ कर वंदना की…
फिर भला रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) कैसे पीछे रहते…”भारत भाग्य विधाता” (जन-गण-मन…) गान की रचना की…!

जार्ज  ने खुश होकर टैगोर जी को इंग्लॅण्ड बुलाया और नोबेल समिति का अध्यक्ष होने के नाते टैगोरे जी को जन गण मन लिखने और गाने के उपलक्ष्य में नोबेल पुरूस्कार देने कि इच्छा जतायी, परन्तु टैगोरे जी ने मन कर दिया और कहा कि वे गीतांजलि लिख रहे है, नोबेल पुरूस्कार उस पर दे दिया जाय
और ऐसा ही हुआ
टैगोरे साहब को सर कि उपाधि भी दी गयी, लेकिन जलियावाला कांड के तहत यह उपाधि उन्होंने पुनः लौटादि !!

जन गण मन कि अस्तित्व में आने तक कि पूरी कहानी जानिए –

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।

गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु।

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली।

संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।

बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तब कहा गया कि वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए।

नेहरु का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु ने इस मुद्दे को गाँधी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु  ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया।

नेहरु कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।

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